हरेली तिहार: छत्तीसगढ़ के माटी, खेती-किसानी अउ लोक संस्कृति के पहिचान!


छत्तीसगढ़ के लोक जीवन, खेती-किसानी अउ माटी के संस्कृति ले गहिराई ले जुड़े हरेली तिहार हमर प्रदेश के पहिली तिहार माने जाथे। सावन अमावस के दिन मनाए जाने वाला ये तिहार हरियर खेत-खार, किसान अउ गांव के जिनगी मं नवा उमंग अउ खुशहाली लेके आथे। हरेली सिरिफ एक तिहार नइ, बल्कि छत्तीसगढ़ के माटी, परंपरा अउ खेती-किसानी जिनगी के पहिचान आय।

हरेली के दिन किसान मन अपन खेती-किसानी के औजार जइसे नांगर, कुदारी, फावड़ा, गैंती अउ बईला-गाड़ी के साफ-सफाई करके पूजा-पाठ करथें। नारियल अउ चाउर के पीसान ले गुड़ के चिला बनाके भगवान ला भोग लगाय जाथे। खेती-किसानी मं उपयोगी बइला अउ गाय मन ल नहवाके, सजाके अउ पूजा करे जाथे। गेहूं के पीसान के रोटी, महुआ के लाटा अउ खम्हार पेड़ के पत्ता मं नमक बांधके लोंदी खवाय के परंपरा घलो हे। किसान मन के मानना हे कि खेती-किसानी अउ पशुधन के बिना गांव के जिनगी अधूरा आय।

गांव म यादव समाज के लोगन मन जंगल जाके जड़ी-बूटी अउ दसमूल के कांदा लाथें। ओकर बाद गांव के सहाड़ा देवता अउ ठाकुरदेव म पूजा-पाठ करके किसान मन ल जड़ी-बूटी देथें। जेकर बदला म किसान मन यादव समाज के लोगन ल सेर-समान के रूप म चांउर, दार अउ दूसर अनाज भेंट करथें। ये परंपरा गांव के आपसी सहयोग अउ भाईचारा के सुंदर मिसाल आय।

हरेली तिहार मं पौनी-पसारी, यादव अउ गांव के बैगा मन घर के मुंहाटी अउ दुआरी म नीम अउ दसमूल-कांदा के डारा खोंचथें। नीम ला सेहत अउ सुरक्षा के प्रतीक माने जाथे। दसमूल-कांदा के डारा घर के मुंहवाटी म खोंचे ले नकारात्मक शक्ति, भूत-प्रेत के बाधा दूर होथे, अइसने लोकमान्यता आज घलो गांव-गांव म देखे बर मिलथे। घर-घर म छत्तीसगढ़ी पकवान बनथे अउ परिवार के मन एक-दूसर ला हरेली के बधाई देथें।

हरेली के सबसे खास अउ मनभावन परंपरा बांस के गेड़ी चढ़ना आय। गांव के लइका, जवान अउ बड़े मन घलो गेड़ी चढ़के तिहार के खुशी मनाथें। संझा बेरा गांव के नौजवान मन गेड़ी दौड़, नारियल फेंक, फुगड़ी, खो-खो, कबड्डी अउ दूसर पारंपरिक खेल खेलथें। गांव के गली-खोर मं गेड़ी के ठक-ठक आवाज अउ हंसी-खुशी के माहौल हरेली के खास पहिचान आय।

हरेली तिहार के नाता प्रकृति अउ हरियाली ले घलो गहिराई ले जुड़े हे। सावन मं धरती हरियर चादर ओढ़ लेथे। खेत-खार म फसल लहलहाय लगथे अउ किसान के मन म नवा आस जागथे। ये तिहार प्रकृति के मान-सम्मान करे, खेती-किसानी के महत्ता समझे अउ पर्यावरण ला बचाय रखे के सुग्घर संदेश बगराथे !

आज के आधुनिक समय म घलो हरेली तिहार के परंपरा अपन रंग नइ गंवाय हे। गांव के संग शहर मं घलो हरेली के आयोजन होवत हे। गेड़ी, पारंपरिक खेल, छत्तीसगढ़ी व्यंजन अउ सांस्कृतिक कार्यक्रम के जरिए नई पीढ़ी ला अपन लोक परंपरा अउ संस्कृति ले जोड़े के प्रयास होवत हे।

हरेली तिहार हमर किसान, माटी, पशुधन, खेती-किसानी, हरियाली अउ छत्तीसगढ़ी संस्कृति के सम्मान के तिहार आय। ये तिहार हमर पुरखों के परंपरा ला जिंदा रखथे अउ अपन माटी ले जुड़े के संदेश देथे। हरेली म छत्तीसगढ़ के गांव, किसान अउ संस्कृति के असली रंग दिखाई देथे।

यही कारण हे कि हरेली हमर बर सिरिफ एक तिहार नइ, बल्कि छत्तीसगढ़ के माटी के पहिचान अउ छत्तीसगढ़िया मन के गौरव आय।

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