कवर्धा :- महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी परिषद, नवा रायपुर अटल नगर द्वारा जारी स्पष्ट और सख्त निर्देशों के बावजूद कबीरधाम जिले में प्रशासनिक उदासीनता की तस्वीर सामने आ रही है। मनरेगा अंतर्गत नियुक्त संविदा एवं मानदेय अधिकारी-कर्मचारियों से योजना के दायरे से बाहर अन्य कार्य कराए जाने के आरोपों पर राज्य स्तर से रिपोर्ट तलब की गई थी। आदेश में साफ कहा गया था कि सात दिवस के भीतर विस्तृत प्रतिवेदन प्रस्तुत किया जाए और संबंधितों को अवगत कराया जाए।
लेकिन समयसीमा बीतने के बाद भी न तो कोई ठोस कार्रवाई सार्वजनिक हुई और न ही जिम्मेदार अधिकारियों की ओर से स्पष्ट जवाब सामने आया। यह स्थिति सीधे-सीधे राज्य स्तर के आदेश की अवहेलना मानी जा रही है। सवाल यह उठ रहा है कि जब शीर्ष स्तर से जारी निर्देशों की यह स्थिति है, तो जमीनी स्तर पर योजनाओं का संचालन किस मानसिकता से किया जा रहा होगा।
मनरेगा जैसी केंद्रीय महत्व की योजना का उद्देश्य ग्रामीण परिवारों को रोजगार की गारंटी देना है। यदि नियुक्त कर्मियों से नियमों के विपरीत अन्य विभागीय या निजी कार्य लिए जा रहे हैं, तो यह न केवल योजना की मूल भावना के खिलाफ है, बल्कि प्रशासनिक अनुशासन पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न लगाता है। राज्य परिषद ने मामले को हल्के में नहीं लिया और निर्धारित समय में रिपोर्ट मांगी, जिससे स्पष्ट है कि शासन इसे गंभीर मान रहा है।
इसके बावजूद जिला स्तर पर चुप्पी साध लेना, कार्रवाई को लंबित रखना या फाइलों को दबाए रखना प्रशासनिक जवाबदेही से बचने की कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। आमजन के बीच यह संदेश जा रहा है कि नियमों की बात केवल कागजों तक सीमित है, जबकि व्यवहार में मनमानी जारी है।
सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि यदि समयबद्ध निर्देशों का पालन नहीं होता, तो शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता पर सीधा असर पड़ता है। सात दिन की स्पष्ट समयसीमा कोई सामान्य प्रक्रिया नहीं थी, बल्कि यह संकेत था कि मामले को प्राथमिकता दी जाए। लेकिन जिला प्रशासन की सुस्ती ने इस प्राथमिकता को ही सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
अब देखना यह है कि क्या राज्य स्तर से दोबारा सख्ती दिखाई जाएगी, या फिर यह प्रकरण भी अन्य मामलों की तरह औपचारिक पत्राचार तक सीमित रह जाएगा। फिलहाल स्थिति यह दर्शा रही है कि आदेश जारी होने और उसका पालन होने के बीच एक बड़ा प्रशासनिक अंतर मौजूद है।
मनरेगा में पारदर्शिता, जवाबदेही और नियमों का पालन सुनिश्चित करना प्रशासन की जिम्मेदारी है। यदि यही जिम्मेदारी निभाने में ढिलाई बरती जाएगी, तो योजना की साख पर गंभीर आंच आना तय है। जिला प्रशासन की चुप्पी और देरी अब स्वयं एक बड़ा सवाल बन चुकी है।